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Chapter 1 - नई शुरुआत

कॉलेज का पहला दिन हमेशा यादगार होता है। हर तरफ़ रौनक, शोर-गुल, दोस्तों की हंसी और कहीं-कहीं नए चेहरों की घबराहट।

उसी भीड़ में एक चेहरा था – रिया।

वो धीमे कदमों से गेट से अंदर आई। सफ़ेद सलवार-कुर्ती, कंधे पर बैग और हाथ में नोटबुक्स। चेहरा मासूम, आँखों में थोड़ी घबराहट लेकिन सपनों की चमक साफ़ दिख रही थी।

वो सोच ही रही थी – “पता नहीं यहाँ दोस्त मिलेंगे या नहीं… सब अजनबी जैसे लग रहे हैं।”

तभी अचानक पीछे से किसी ने टक्कर मारी और उसकी सारी किताबें ज़मीन पर गिर गईं।

"ओह सॉरी!" – आवाज़ आई।

रिया झुकी और किताबें उठाने लगी। सामने जो खड़ा था, उसे देखकर वो थोड़ी देर के लिए रुक गई।

लड़का लंबा, स्मार्ट, चेहरे पर हल्की सी शरारती मुस्कान और आँखों में एक अजीब सा कॉन्फिडेंस। वही था – कबीर, कॉलेज का सबसे पॉपुलर लड़का।

कबीर ने किताब उठाते हुए कहा –

"पहले दिन ही मुझसे टक्कर? लगता है किस्मत बहुत अच्छी है मेरी।"

रिया ने किताब खींचते हुए कहा –

"किस्मत नहीं, आपकी लापरवाही है। देखिए, मेरी सारी नोट्स गिर गईं।"

कबीर ने हँसते हुए जवाब दिया –

"इतना गुस्सा… अच्छा, सॉरी के बदले मैं आपको कैंटीन में कॉफी पिला देता हूँ।"

रिया ने सीधा जवाब दिया –

"पहले दिन ही कॉफी? Thanks, but no thanks."

और वो वहाँ से तेज़ी से चली गई।

कबीर मुस्कुराता रह गया –

"लड़की तो दिलचस्प है… attitude कमाल का है।"

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दूसरे दिन क्लास में प्रोफेसर ने प्रोजेक्ट्स के लिए टीमों का ऐलान किया।

"रिया और कबीर – तुम दोनों एक ही टीम में हो।"

रिया का चेहरा उतर गया।

"हे भगवान! यही बाकी था…"

कबीर ने पास आकर धीमे से कहा –

"तो Miss Attitude, अब बचकर कहाँ जाओगी?"

क्लास में सब हँसने लगे और रिया गुस्से से किताबें बंद करने लगी।

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पहली बार प्रोजेक्ट पर काम करने के लिए दोनों लाइब्रेरी में मिले।

रिया सीरियस होकर बोली –

"देखो, मुझे मज़ाक पसंद नहीं। ये प्रोजेक्ट important है, समझे?"

कबीर कुर्सी पर फैलकर बोला –

"Relax! मैं भी सीरियस हूँ। लेकिन एक बात बताओ… तुम हमेशा इतना गुस्सा क्यों करती हो?"

रिया ने चिढ़कर कहा –

"गुस्सा नहीं करती, बस बकवास सुनने का टाइम नहीं है।"

कबीर मुस्कुराया –

"तो फिर मैं वादा करता हूँ… थोड़ी कम बकवास करूँगा।"

दोनों एक-दूसरे की तरफ़ देख कर हँस पड़े।

वो पहली बार था जब रिया ने कबीर की मुस्कान ध्यान से देखी… और कबीर ने रिया की आँखों की मासूमियत।

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दिन बीतने लगे।

कभी लाइब्रेरी में किताबों पर बहस, कभी कैंटीन में प्रोजेक्ट की बातें, तो कभी दोस्तों की मस्ती में नोकझोंक।

धीरे-धीरे दोनों के बीच एक अनजाना रिश्ता बनने लगा।

रिया को कबीर की बातें अब परेशान नहीं करतीं, बल्कि हँसा देतीं।

कबीर को रिया की नाराज़गी अब प्यारी लगने लगी।

और एक शाम, जब प्रोजेक्ट पूरा होने के बाद दोनों कैंपस के गार्डन में बैठे थे… रिया ने महसूस किया कि उसका दिल तेज़ी से धड़क रहा है।

कबीर मुस्कुरा रहा था, और उस मुस्कान को देखते ही रिया समझ गई –

ये धड़कनें कोई और नहीं…

उसकी पहली धड़कन थीं। ❤️

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